COPYRIGHT © RAJIV MANI, Journalist, Patna

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गुरुवार, 9 अक्तूबर 2014

पटना : सावधानी हटी, दुर्घटना घटी

चर्चा में
बिहार के लोगों के लिए शुक्रवार की संध्या काफी भयावह रही। इस दिन पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में रावणवध का कार्यक्रम था। पुतला दहन कार्यक्रम समाप्त हो चुका था। करीब तीन लाख की भीड़ बाहर निकलने को उमड़ पड़ी थी। भीड़ से किसी ने चिल्लाया कि बिजली का तार गिरा है। इसमें करंट है। फिर क्या था, भगदड़ मच गयी और देखते ही देखते 33 लोग काल की गाल में समा गये। मरने वालों में 20 महिलाएं व 11 बच्चे-बच्चियां थीं। 50 से ज्यादा गंभीर रूप से जख्मी हुए। दर्जनों लोग अब भी लापता हैं। थोड़ी ही देर में प्रेसकर्मी पहुंच खबर पहुंचाने लगें। देखते ही देखते पूरे भारत में ब्रेकिंग न्यूज चलने लगा। नेता जी भी आए, घंटों बाद !
पुतला तो जला, पर रावण नहीं : यह कैसी विडम्बना है कि जिस रावण का पुतला हम देश भर में प्रतिवर्ष जलाते हैं, वह विद्वान और अत्यंत बलशाली था। उसके चरित्र पर भी किसी को संदेह नहीं होना चाहिए। शास्त्रों में चर्चा है कि वह भगवान राम के हाथों मरकर मोक्ष को प्राप्त करना चाहता था। इस कारण ही उसने सीता का हरण किया था। 
इधर, शुक्रवार की घटना के दिन तो यहां अनेकों ‘रावण’ साक्षात दिखें। घायलों व मृतकों के शरीर से गहने लूटे गये। भगदड़ के बीच ही लड़कियों व महिलाओं से छेड़छाड़ की घटनाएं हुईं। ना कहीं प्रशासन के लोग दिख रहे थें, ना कोई संगठन !
हां, ‘राम’ की भी कमी नहीं थी। जनता के बीच ही ऐसे कई लोग थे, जो लोगों-घायलों को बचाने में लगे थें। उन्हें अपने परिवार व बच्चों का भी ख्याल न रहा था। वे चोट खाते रहें, घायल होते रहें, दूसरे घायलों को निकाल सुरक्षित जगह व अस्पताल पहुंचाते रहें। 
शुरू हुआ राजनीति का खेल : इतना कुछ हो जाये और इसपर राजनीति न हो, यह कैसे संभव था। इसी रात विभिन्न पार्टियों के बयान आने लगे। मृतक के परिजनों को राज्य सरकार ने तीन लाख और केन्द्र सरकार ने दो लाख रुपए मुआवजा देने का ऐलान किया। गंभीर जख्मी को 50 हजार रुपए और आंशिक घायलों को 20 हजार रुपए देने की बात कही गयी। साथ ही, जांच के आदेश दे दिये गये। बाद में पटना प्रमंडल की कमिश्नर एन. विजयलक्ष्मी, डीएम मनीष कुमार वर्मा, एसएसपी मनु महाराज और डीआईजी अजिताभ कुमार पर गाज गिरी। इसके अलावा स्पेशल ब्रांच (पटना) के एसएसपी रंजीत कुमार मिश्रा और रेल एसपी उपेन्द्र कुमार सिन्हा का स्थानांतरण कर दिया गया। भारतीय प्रशासनिक सेवा के छह और भारतीय पुलिस सेवा के पांच अधिकारियों का तबादला हुआ। अभी जांच चल ही रही है।
सरकारी अस्पताल की दुर्दशा : इधर घायलों से सरकारी अस्पताल पीएमसीएच भर गया। कई डाॅक्टर ड्यूटी से लापता थे। दवा की पर्याप्त व्यवस्था नहीं। जांच और अन्य दूसरी सेवाओं का कोई नाम नहीं। यहां दिन में ही स्थिति राम भरोसे रहती है। ऐसे में समझा जा सकता है कि जब घायलों को अंधेरा होने के बाद लाया गया, क्या स्थिति रही होगी। घायलों के साथ आए परिजन, बचाव कार्य में लगे लोग, मीडियाकर्मी और कुछ अन्य भीड़ से पीएमसीएच खचाखच भर गया। मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी व अन्य कई नेता भी पहुंचे। लेकिन, घायलों को जिस चीज की जरूरत थी, वह ही नहीं मिल रही थी। ना पर्याप्त डाॅक्टर, ना दवा, ना अन्य स्टाफ। अंततः मुख्यमंत्री को यह कहना ही पड़ा कि भगवान भरोसे है पीएमसीएच !
घटना को लेकर चर्चा : अब इस घटना को लेकर विभिन्न तरह की पड़ताल की जा रही है। आयोजन गांधी मैदान में था। तीन लाख लोगों की भीड़ थी। इसके बावजूद चार में से तीन गेट वीआईपी के लिए और सिर्फ एक गेट आम जनता के लिए खोले गए। आम जनता को निकलने के लिए दक्षिणी गेट को खोला गया था। यहीं भगदड़ मची। यहीं हाइमास्ट लाइट लगी है, जो जली नहीं। इस कारण यहां रोशनी की बेहद कमी थी। साथ ही, यहां सीडीपीओ बबिता कुमारी और दारोगा गौतम कुमार की ड्यूटी लगी थी। अन्य पुलिसकर्मी यहां नहीं दिखे। बताया जाता है कि रावण का पुतला जलते ही अधिकांश पुलिस अधिकारी वीआईपी के काफिले के साथ चल दिये। जब भगदड़ मची, भीड़ को नियंत्रित करने व लोगों को संभालने व दिशा निर्देश देने के लिए यहां कोई अधिकारी मौजूद न थे। 
अभी खुलने हैं कई राज : इस पूरी घटना पर अभी रिपोर्ट आनी बाकी है। जबतक पूरी बात लोगों के सामने नहीं आ जाती, कई राज खुलने बाकी हैं। कुछ-कुछ आने भी लगे हैं। अदालत घाट पर कपड़े में लपेटे पांच अज्ञात लाशें मिलीं। इससे फिर सनसनी फैल गयी। कई लोगों का आरोप है कि अब भी उनके परिजन लापता हैं। ना तो उनका नाम मृतकों की सूची में है और ना ही घायलों की सूची में। वे अपने चहेतों को खोजकर परेशान हैं। इनकी परेशानी का जवाब किसी के पास नहीं है। है क्या ?