COPYRIGHT © RAJIV MANI, Journalist, Patna

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गुरुवार, 27 नवंबर 2014

1934 का वह जलजला

PN  SINHA
मेरे नाना जी, श्री प्रभु नारायण सिन्हा, अपने जीवन में 86 बसंत देख चुके हैं। आज वे शरीर से लाचार हैं, लेकिन ज्ञान और याद्दाश्त के मामले में मैं उनका पसगा-भर भी नहीं। गुलाम भारत से लेकर आजतक उन्होंने जो कुछ देखा, महसूस किया, उन घटनाओं को यहां धारावाहिक के रूप में मैं देने की कोशिश करूंगा। काफी जतन के बाद वे इसके लिए तैयार हुए। यह संस्मरण उन्होंने ही लिखकर दिया है। उन्होंने जैसा लिखा, वैसा ही मैं प्रस्तुत कर रहा हूं। 
नाना जी की डायरी 
1934 की जनवरी की 15 तारीख। मैं साढ़े पांच साल का। केवल मोटिया की अधवांही मिरजई में। मैं बिहार की राजधानी पटना से दस-बारह मील दूर नेउरा, तत्कालीन भारत का लंदन, से सटी बस्ती टिकैतपुर में अपने मामा के साथ नानिहाली घर से संलग्न खलिहान में उछल-कूद कर रहा था। मामा दो-तीन गाही (पांच की संख्या) नेबारियों को गड़ासी से काट कर गाय-भैंस के लिए चारा बनाने को बैठ रहे थे। एक-डेढ़ बजे दोपहर की बेला थी। अचानक गड़गड़ाहट की आवाज आई और धरती हिलने लगी। 
मेरे मामा कुछ बोले। मैंने सुना - बाघ आया, बाघ आया, भागो, भागो। मैं खलिहान से दौड़कर दरबाजा से भीतर अपनी मां के पास दौड़ पड़ा। छप्पर से खपड़े गिर रहे थे। खूटों पर गाय-भैसें कूद रही थीं। जैसे-तैसे जनानी किता तक पहुंचा, तो देखा - सभी औरतें, मेरी मां, मामी, दीदी, बड़े-छोटे बच्चों को पकड़े हुए आंगन के बीच एक दूसरे से सटकर बैठी थीं। एक ने मुझे झपट कर पकड़ा और उसी मंडली में बिठा लिया। तुरंत सबकुछ शांत हो गया। क्या था ? पूछा। बाघ तो बाहर से ही भाग गया। एक ने कहा, बाघ नहीं, धरती डोली थी। देखा, खपड़े गिरकर टूटे हैं। दीवार टेढ़ी हो गई। तबाही मच गई। सबकुछ अस्त-व्यस्त। 
चार-पांच दिन तक सब दहशत में रहे, आज फिर वैसा ही होगा। रात को होगा। पांच-छः घंटे बाद होगा। पखवारा लगा - सामान्य होने में। कोई न था, जिसे हानि नहीं पहुंची। कहीं किसी का प्रिय घायल हो गया, कहीं कोई चल बसा, किसी का सुहाग लुट गया और किसी का कोख उजड़ गया। दूर-दराज रिश्तेदारों का अता-पता नहीं, सूचना तंत्र का अभाव था। केवल डाकघर और टक्कू-टक्कू-ट्रा-ट्रा से तार का आना-जाना - टेलीग्राफ से समाचार या डाक दौराहा द्वारा संदेश भेजना ही संभव था। यातायात के साघन नहीं। सब भगवान पर छोड़कर उसकी शरण में शांति पाने का प्रयास करते थे। 
चैबीस घंटे पहले की चहल-पहल और रंगीनी की याद कष्ट को कई गुणा कर रही थी। 14 जनवरी मकर संक्रांति - तिल संक्राति या बोलचाल में दही-चूरा का दिन था, उमंगों से भरपूर। नदी-सरोवर में स्नान कर तिल-दही-चूरा-गुड़ के दान के साथ मनभर दही-चूरा-तिलकुट खाने-खिलाने का दिन। रात में खिचड़ी के चार यार - दही, पापड़, घी, अंचार, के साथ आसपास के संगी-साथियों से मिलजुल-बैठकर भरपेट चटपटी भोजन का आनन्द सहित हंसी-दिल्लगी करते रात की मदहोशी भरी घोर निद्रा में खो जाना और सबेरे देर से जागना। बीते दिन की खुशनुमा यादें ताजा ही थीं कि नितांत विपरीत परिस्थितियों वाली दुखान्तक घटना से दो-चार होना पड़ा। क्षणभर में सारा दृश्य बदल गया। सब ओर विध्वंश, हर चेहरा फक्क, बोलती बंद, केवल आंखों से वेदना फूट रही थी। 
आज जब छियासी के इस बुड्ढ़े लेखक के मानस पटल पर वह मंजर चमक जाता है, तो मानो पलक मारने भर को ईश्वर दिख जाता है। या ऐसा भी लगता है कि चैबीस घंटे उमंगोल्लास में मग्न मन को जलजला का एक तीक्ष्ण अकस्मात झोंका ने पुरुषत्व को किंकत्र्तव्यविमूढ़ कर दिया हो। 
लेखक परिचय : छियासी वर्षीय श्री प्रभु नारायण सिन्हा रांची उच्च न्यायालय से शपथ आयुक्त के पद से सेवानिवृत्त हैं। आप हिन्दी, अंग्रेजी, संस्कृत, उर्दू-फारसी, पाली, कैथी के काफी अच्छे जानकार हैं। आपकी लिखी कानून की कई किताबें प्रकाशक मल्होत्रा ब्रदर्स, पटना प्रकाशित कर चुका है। साथ ही, हिन्दी-अंग्रेजी अर्थ सहित ‘‘विधिक लैटिन शब्दावली’’ का प्रकाशन भी वर्ष 1997 में हो चुका है। आपसे लिए गये साक्षात्कार के आधार पर दर्जनों फीचर-लेखों का प्रकाशन दैनिक ‘हिन्दुस्तान’, पटना ने किया है।