COPYRIGHT © RAJIV MANI, Journalist, Patna

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शुक्रवार, 7 नवंबर 2014

आंगनबाड़ी केन्द्र में सहायिका बनने को बन गयी विधवा !

न्यूज@ई-मेल 
औरंगाबाद : एक कहावत है - बाप बड़ा न भइया, सबसे बड़ा रुपैया! जी हां, पैसों के लिए लोग क्या नहीं कर सकते हैं। अपने सगे-संबंधियों को मार भी सकते हैं। अधिकांश कुकर्म आज पैसों के लिए ही हो रहे हैं। कुछ ऐसा ही मामला औरंगाबाद में देखने को आया। एक महिला ने आंगनबाड़ी केन्द्र में सहायिका का पद पाने के लिए खुद को विधवा घोषित कर दिया। मामला बिहार के औरंगाबाद के ओबरा प्रखंड के ग्राम गैनी का है। विडम्बना यह है कि इस तथाकथित विधवा का पति गोह प्रखंड में पंचायत शिक्षक के पद पर कार्यरत हैं। इतना ही नहीं, मैडम अपने पति के साथ ही रह रही है। 
आइए पूरा मामला देखते हैं, गैनी में दीपक कुमार रहते हैं। यहीं गैनी में आंगनबाड़ी केन्द्र में सहायिका का पद रिक्त है। दीपक ने अपनी पत्नी अनु कुमारी से इसके लिए आवेदन भरवा दिया। अनु स्नातक उत्र्तीण है। वह मैट्रिक से स्नातक तक प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण है। इस वजह से अनु का मेधा अंक 84 हो जाता है। प्रेषित आवेदनों के अनुसार, अनु कुमारी अव्वल स्थान पर है। लेकिन, सीडीपीओ ने अनु कुमारी से रिश्वत की मांग की। इसी वजह से सीडीपीओ और आवेदिका के बीच जंग शुरू हो गयी। रिश्वत ना देने पर किसी भी हाल में अनु को सेविका नहीं बनाने पर सीडीपीओ साहब अडिग हैं। साथ ही, मुखिया भी इस मामले में दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं। इस कारण सीडीपीओ का हौसला सातवें आसमान पर है। 
इस बीच खेल का फायदा एक अन्य मुखिया ने उठाना शुरू कर दिया। मुखिया ने सीडीपीओ से संपर्क साधकर दूसरी आवेदिका संगीता कुमारी को चयन करने का दबाव डाला। किसी भी हाल में वे जुगाड़ लगाने पर अमादा हो गए। ऐसे में सीडीपीओ ने पैसों की शर्त पर समाज कल्याण विभाग का नियम का सहारा लेकर एक मंत्र बता दिया। सीडीपीओ ने विभागीय नियमावली का सहारा लेकर संगीता कुमारी को बेसहारा होने का ढांेग रचने को कह दिए। कोर्ट से विधवा या परित्यक्ता का शपथ-पत्र पेश करना है। ऐसा करने से मेधा अंक में 7 अंक अतिरिक्त जुट जाता है। और तो और, सात जनम तक साथ निभाने का वादा करने वाली संगीता ने भी अपने जीवित पति को परलोक सिधार चुकने का शपथ-पत्र बनवाकर पेश कर दिया। ऐसा करने से उसका मेधा अंक 82$7=89 हो गया। अब संगीता मेधा सूची में सर्वाेच्च स्थान पर आ गयी। 
अनु के पति दीपक कहते हैं कि संगीता सीडीपीओ के जाल में बुरी तरह फंस चुकी है। उसने कोर्ट से शपथ-पत्र बनाकर पेश किया है। अगर विधवा या परित्यक्ता का शपथ-पत्र बनाया है, तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। आज भी संगीता अपने पति के साथ रहती है। उसके परिवार में कलह नहीं है। संगीता के पति गोह प्रखंड में पंचायत शिक्षक के पद पर कार्यरत हैं। 
इधर, प्रभावित अनु ने भी नियमावली का सहारा लिया है। उनके अनुसार, इस पद के लिए जिले में कार्यरत किसी भी सरकारी कर्मचारी या अधिकारी की पत्नी का चयन तो दूर, वह आवेदन भी नहीं दे सकती। ज्ञात हो कि शपथ-पत्र के आधार पर हिन्दू में विवाह विच्छेद का कोई कानूनी प्रावधान नहीं है। ऐसे में अब संगीता ही बता सकती है कि वह जिस व्यक्ति के साथ पति-पत्नी के रूप में रह रही है, उससे उसका क्या संबंध है। साथ ही, उसे कोर्ट में यह साबित भी करना होगा। 

जिले के 99 फीसदी मिडिल स्कूलों में प्रधानाध्यापक नहीं !

बेगूसराय : जिले में करीब 710 मिडिल स्कूल हैं। इनमें मात्र एक प्रतिशत स्कूलों में प्रधानाध्यापक बहाल हैं। कहने का मतलब कि 99 प्रतिशत मिडिल स्कूलों में प्रधानाध्यापक बहाल ही नहीं हैं। मजे की बात यह है कि इन 99 प्रतिशत मिडिल स्कूलों में स्वयंभू प्रधानाध्यापक काम देख रहे हैं। ऐसे प्रधानाध्यापकों को प्रभारी प्रधानाध्यापक कहा जाता है। इनको अधिकारिक तौर पर शिक्षा विभाग ने प्रधानाध्यापक पद पर काम करने के लिए विधिवत प्रक्रिया के तहत कोई आदेश या अधिकार नहीं दिया है।
प्राथमिक शिक्षिका अनुपमा सिंह बताती हैं कि बेगूसराय के मिडिल स्कूलों में वैध व ठोस अकादमिक व प्रशासनिक व्यवस्था बहाल किये जाने की मांग को लेकर प्राथमिक शिक्षकों ने साझा मंच के बैनर तले जनप्रतिनिधियों के ध्यानाकर्षण के लिए एक यात्रा का आयोजन किया। 25/10/14, 26/10/14 एवं 27/10/14 को क्रमशः तेघड़ा, मंझौल और बखरी अनुमंडल के जिला पार्षद क्षेत्र सं. 03, 04, 05, 09, 12, 13 और 15 प्रखंड प्रमुख बछवाड़ा, भगवानपुर, वीरपुर, चेरिया बरियारपुर, खोदावंदपुर, छौराही, गढ़पूरा, नावकोठी व बखरी तथा मुख्य पार्षद व उपमुख्य पार्षद नगर पंचायत बीहट, तेघड़ा बखरी से मिलकर ज्ञापन सौंपे। उन्होंने कहा कि जिले के प्रयोगधर्मी और नवाचारी शिक्षकों की यह खास मुहिम जारी रहेगी।

अवैध कमाई में लगे हैं बिजली विभाग के अभियंता

गया : विद्युत विभाग के मजदूर और संविदा पर बहाल मजदूरांे की मजदूरी में काफी असमानता है। संविदा पर बहाल मजदूरों को मिलने वाले मानदेय से ठेकेदार और कनीय अभियंता अपना-अपना हिस्सा लेते हैं। इन मजदूरों को पांच हजार रुपए मिलते हैं। मगर ठेकेदार और कनीय अभियंता 500-500 रुपए हड़प लेते हैं। शेष चार हजार रुपए ही मजदूरों को प्राप्त होते हैं। मजदूरों की मांग है कि उन्हें पूरे पैसे मिलने चाहिए। साथ ही, विभाग की ओर से यूनिफाॅर्म एवं जूते की व्यवस्था भी होनी चाहिए।
मजदूरों का कहना है कि कनीय विद्युत अभियंता द्वारा एक पिलास और गलाब्स ही मुहैया कराया जाता है। इसी के बल पर तीन शिफ्ट में काम लिया जाता है। एक शिफ्ट में 4 मजदूर कार्य करते हैं। प्रथम शिफ्ट रात 12 से सुबह 8 बजे तक, द्वितीय शिफ्ट 8 से 4 बजे तक और तृतीय शिफ्ट शाम 4 से रात 12 बजे तक होता है। एक मजदूर अलग से दिन में कार्यरत रहता है, जो बिजली बिल का भुगतान नहीं करने वाले उपभोक्ताओं के लाइन काटता है। एक कनीय अभियंता के साथ 15 मजदूर कार्य करते हैं। इसी से अंदाज लगाया जा सकता है कि इन मजदूरों से प्रतिमाह कितनी अवैध कमाई होती है। साथ ही, घर में छापेमारी करते समय भी उपभोक्ताओं से मोटी रकम अभियंता ऐंठते हैं।