COPYRIGHT © RAJIV MANI, Journalist, Patna

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गुरुवार, 11 दिसंबर 2014

... और आईके गुजराल को भूला दिया

न्यूज@ई-मेल
वीरेन्द्र कुमार यादव
भारत में जाति व विरासत के बिना न राजनीति संभव है और न विचारधारा का स्वांग। कांग्रेस प्रधानमंत्रियों की जयंती विरासत के कारण याद की जाती है। वहीं वीपी सिंह की जयंती जाति के कारण मनायी जाती है। पूर्व प्रधानमंत्री आईके गुजराल की राजनीति में न जाति थी, न विरासत। इसलिए जयंती के मौके पर अपनों ने ही भुला दिया। जिस जनता दल के सांसद के रूप में उन्होंने देश के 13वें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली थी, वही दल आज टुकड़ों में बंट कर अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रहा है और उसके नेता भविष्य की राह तलाश रहे हैं। इन नेताओं को न गुजराल याद रहे, न उनकी जयंती।
जयंती पर नमन  (4 दिसंबर) : चार दिसंबर आईके गुजराल की जयंती तिथि है और इसी तारीख को छह टुकड़ों में बंटे दल के नेता एक होने के स्वांग रच रहे थे। इन्हीं छह में से दो नेता लालू यादव व मुलायम सिंह यादव की आपसी लड़ाई में आईके गुजराल के लिए प्रधानमंत्री पद का रास्ता प्रशस्त हुआ था। आज इन नेताओं ने दो घंटे तक भाजपा के कोप से बचने के रास्ते तलाशते रहे, लेकिन उन्हीं के कुनबे के आईके गुजराल याद नहीं आए। गुजराल की जयंती के बहाने यह चर्चा इसलिए भी आवश्यक हो जाती है कि विचारधारा के स्वांग रचने वाले इन नेताओं की राजनीतिक धारा सत्ता और परिवार की सत्ता आगे नहीं जाती है।
बिहार के ही सांसद थे गुजराल : उत्तर प्रदेश को प्रधानमंत्रियों का राज्य कहने वाले लोग यह भूल जाते हैं कि आईके गुजराल बिहार से राज्यसभा सदस्य के रूप में देश के प्रधानमंत्री चुने गए थे। बिहार की राजनीतिक जमीन ने न केवल मधु लिमये, जार्ज फर्नांडीज, आचार्य कृपलानी को लोकसभा के लिए भेजा, बल्कि आइके गुजराल को भी 1992 में राज्यसभा के लिए भेजा था। उस समय राज्यसभा सदस्य के रूप में उस राज्य का निवासी होना आवश्यक था, इसलिए उनका आवासीय पता भी पटना का ही था। आईके गुजराल तीन बार राज्यसभा के लिए और दो बार लोकसभा के लिए चुने गए थे। वह 1964 से 1976 तक पंजाब से राज्यसभा के सदस्य थे। इस दौरान वह केंद्रीय मंत्री भी बने थे। 1989 में पंजाब के जालंधर से जनता दल के टिकट पर लोकसभा के लिए चुने गए थे। उन्होंने 1991 में पटना से लोकसभा का चुनाव लड़ा था, लेकिन विवाद के कारण चुनाव रद्द कर दिया गया। इसके बाद 1992 में राज्यसभा के लिए बिहार से जनता दल के उम्मीदवार के रूप में निर्वाचित हुए थे। इसी दौरान राजनीतिक परिस्थितियों ने उन्हें प्रधानमंत्री बना दिया था। प्रधानमंत्री रहते हुए 1998 में वे जालंधर से दूसरी बार निर्वाचित हुए। इस बार उन्हें निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में अकालीदल का समर्थन प्राप्त था। हालांकि इस बात के लिए बिहारियों को गर्व होना चाहिए कि बिहार ने भी प्रधानमंत्री दिया है।

शिवानंद ने चुनावी राजनीति को कहा अलविदा 

राज्यसभा के पूर्व सांसद और समाजवादी राजनीति के वैचारिक धरातल को सिंचते रहने वाले शिवानंद तिवारी ने कहा है कि चुनाव की राजनीति अब और नहीं। लेकिन, राजनीति में अपनी उपस्थिति व जिम्मेवारियों से भागेंगे भी नहीं। राजनीति के वैचारिक संघर्ष में हस्तक्षेप को पुख्ता करते रहेंगे।
जीवन के अनुभवों पर लिखेंगे किताब : 72 बसंत गुजार चुके शिवानंद तिवारी अब (09 दिसंबर को) जीवन के 73वें बसंत का स्वागत कर रहे हैं। इस मौके पर उन्होंने अपनी योजनाओं का खुलासा किया है। उन्होंने कहा कि काफी सोच-विचार कर मैंने तय किया है कि अब न कभी चुनाव लड़ूंगा और न किसी राजनीतिक दल में शामिल होऊंगा। लेकिन, राजनीति से अलग नहीं रहूंगा। बहत्तर साल लंबा समय होता है। अपने जीवन में बहुत कुछ बदलते देखा है मैंने। श्री तिवारी ने कहा कि मैंने तय किया है कि अपने संस्मरणों के जरिये इस बदलाव की कहानी लिखूंगा। जीवन का अधिकांश समय मैंने राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप बिताया है। इस दौरान मैंने जो कुछ देखा, सुना और अनुभव किया है, उसको ईमानदारी के साथ लिखने की कोशिश करूंगा। फिलहाल भविष्य की यही योजना है।
भविष्य को लेकर रहे बेपरवाह : उन्होंने कहा कि यूं समझदार बताते हैं कि जीवन की शुरुआत में भविष्य की योजना बना लेनी चाहिए। इससे जीवन में लय बना रहता है। लेकिन, समझदारों की सलाह मानकर वैसी कोई योजना अपने जीवन की शुरुआत में मैंने नहीं बनाई। मेरी जिंदगी बहुत उबड़-खाबड़ या यूं कहें कि अराजक-सी रही है। काफी संघर्ष रहा है। लेकिन संघर्ष में कभी मैंने पीठ नहीं दिखाई। हमेशा आमने-सामने रहा। भविष्य को लेकर हमेशा बेपरवाह रहा हूं। जिंदगी में ज्यादातर फैसला लेने में मैंने दिमाग से ज्यादा दिल की बात मानी है। इस वजह से जो लोग जिंदगी को नफा-नुकसान की तराजू पर तौलते हैं, उनके मुताबिक मेरे हिस्से में नुकसान ज्यादा आया।
लालू-नीतीश ने किया अपना नुकसान : श्री तिवारी ने कहा कि लोहिया विचार मंच और समता संगठन से हटने के बाद जब चुनाव की राजनीति में आया, तो अबतक लालू और नीतीश के साथ ही रहा। इन दोनों के साथ बहुत पुराना रिश्ता रहा है। लालू से पचास-पचपन वर्षों का, तो नीतीश से भी लगभग चालीस-बयालीस वर्षों से रिश्ता है। लेकिन, आज इन दोनों से अलग हूं। सच कहा जाय तो दोनों ने मुझे अपने से अलग कर दिया। मैं उनकी परेशानी समझता हूं। आज की राजनीतिक संस्कृति के अनुसार, मैं अपने को ढाल नहीं पाया। अतः इन दोनों के गले में अटकता हूं। मुझे इस बात का खेद है कि दोनों ने अपने अहं की वजह से अपना नुकसान तो किया ही, समाज को भी इनसे जितना मिल सकता था, वह नहीं मिला।
वीरेन्द्र कुमार यादव पत्रकार हैं।