COPYRIGHT © RAJIV MANI, Journalist, Patna

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रविवार, 29 मार्च 2015

माली की अभिलाषा

Dr. Lalji Prasad Singh, Writer-Poet
 कविता 
कवि : डाॅ. लालजी प्रसाद सिंह 
ऐ माली महान !
तुम्हारे पुष्प की अभिलाषा महान !
जो चाहता रौंदाना
देशभक्तों के कदमों तले आना ।
जिसे पूजनीय बनने की नहीं चाह
जिसे प्रेमी के प्यार की नहीं परवाह ।
इसके आगे उसे नहीं कोई जिज्ञासा
उसकी आशा की यही अन्तिम भाषा ।
किसी कवि की कैसी यह कोरी कल्पना है
तुम्हारे जीवन के बारे में नहीं कोई सपना है ।
रोपते रहो फूल बस यहीं तक सोचना है
बदहाली में तुम्हें तुम्हारे बच्चों को नोचना है ।
या बिलबिलाते हों भूखे तो पेट दाब सोना है
तुमको परिवार संग जीवन भर रोना है ।
फिर कैसा है फूल तेरा उसकी कैसी अभिलाषा ?
कैसा है जीवन तेरा यह कैसी तमाशा ?
जब खिलखिलाता तुम्हारा फूल,
तुम क्यों नहीं चहक सकते ?
उसकी खुशबू से खुश होते लोग
तुम क्यों नहीं महक सकते ?
किन्तु ढील-चीलर के संग
तुम्हें झोपड़ी में रहना है । 
रोजी-रोटी की आस में 
हर संकट को सहना है ।
क्या तुम्हें पता कुछ भी है माली ?
तुम्हारी मिट सकती कैसे बदहाली ?
क्या तुम्हारा पुष्प ही सिर्फ कर सकता अभिलाषा ?
तुम कह भी नहीं सकते अपने श्रम की भाषा ?
तुम्हारे पुष्प के बारे में बहुत कुछ
कह गया कवि कोई,
तुम्हारे दर्द की अनदेखी कर
उभार गया छवि कोई।
बोलो माली - बोलो,
अब तुम्हें ही बोलना है ।
ऊपर-ऊपर देखने वालों का
भेद तुम्हें ही खोलना है ।
पूछो उनसे 
कि सृजन वाले हाथ उन्हें क्यों नहीं दीखते ?
शासक अंग्रेजों का पाठ छोड़
जन-सेवा का पाठ क्यों नहीं सीखते ?
क्या नहीं तुम्हारी अभिलाषा कि हो अपनी खुशहाली ?
रहे भरा-पूरा घर अपना चारों तरफ हरियाली ?
यदि सचमुच गणों का तंत्र यह देश 
फिर तुम्हीं क्यों सहते रहो जीवन भर क्लेश ?
तुम रहो फटेहाल फूल करते रहो भेंट !
जुल्मी इस देश को करते रहें मटियामेट !
नहीं माली नहीं, तुम्हें हक अपना छीनना होगा ।
शोषकों को हर हाल में दिन अपना गिनना होगा । 
रोपते तुम विविध फूल बनाते हो चमक
नमन तुम्हें नमन है कोटिशः है नमन ।
समझता मैं तुम्हें तुम्हारी अभिलाषा
होती नहीं किसे अच्छे जीवन की आशा ?
परिचय : डाॅ. लालजी प्रसाद सिंह महंत हनुमान शरण काॅलेज, मैनपुरा, पटना में राजनीति विज्ञान विभाग के अध्यक्ष एवं बीआईटीएनए, पटना के प्रवक्ता हैं। आपकी दर्जनों कहानी-संग्रह, कविता-संग्रह, उपन्यास, यात्रा-संस्मरण व बाल कहानी लालजी साहित्य प्रकाशन से प्रकाशित हो चुकी हैं। आप पुस्तक मेला के अलावा अपनी भी पुस्तक प्रदर्शनी गांव देहातों में लगाते रहे हैं।