COPYRIGHT © RAJIV MANI, Journalist, Patna

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सोमवार, 9 मार्च 2015

हमीं से मुहब्बत हमीं से लड़ाई

  मजाक डाॅट काॅम  
 3 
राजीव मणि 
कोई मुझे बसंती कहता है, कोई छबीली। छम्मकछल्लो, छमिया, मोना डार्लिंग, रानी और ना जाने क्या-क्या नाम लेकर लोग मुझे पुकारते हैं। मैं अपने फैन के किसी बात का बुरा नहीं मानती। मेरे फैन ने और भी कई नामों से नवाजा है मुझे। जिस नाम से चाहो पुकार लो, मगर प्यार से। हां, मैं किसी के मुंह नहीं लगती। मुंह लगाना तो छोटों का काम है। मेरा अपना एक स्तर है। इसे नीचा नहीं गिरा सकती। इसी कारण समाज में मेरा भाव ऊंचा है। लक्ष्मी को पूजती हूं मैं। ‘कामदेव‘ की इज्जत करती हूं। अगर मैं नाराज हो जाऊं तो तमंचे पर डिस्को करवा देना कोई बड़ी बात नहीं। ढल गयी तो जन्नत की सैर ! 
हां, मैं वेश्या हूं। काफी नाम है मेरा। प्यार से पुकारो तो हर जगह मिल जाती हूं। हर समाज में कद्र है मेरा। यह बात अलग है कि मैं ही किसी का कद्र नहीं करती। यह मेरा स्टाइल है। फिर भी, करोड़ों ‘फाॅलोअर्स‘ हैं मेरे। बन-ठन कर निकल जाऊं तो देखते ही देखते लाखों ‘लाइक‘ मिलने में देर नहीं लगते। सर्वत्र पूजी जाती हूं मैं। बड़े-बड़े राजा-महाराजा तक को पांव की जूती समझती हूं। राजा को रंक और रंक को फकीर बनाते मुझे देर नहीं लगता। अच्छे-अच्छे साधु-महात्माओं की तपस्या पलक झपकते ही भंग कर सकती हूं। मेरी बहनें इन्द्रलोक में अप्सरा की पदवी पाती हैं। मां दुर्गा की प्रतिमा बनाने को मेरे ही आंगन से मिट्टी जाती है। 
मेरा और क्या परिचय चाहिए। सच्चाई यह है कि मैं किसी परिचय का मोहताज नहीं। सदियों पुराना इतिहास है मेरा। देवदासी तो तुमने सुना ही होगा ? छोड़ो ना, मैं युगों-युगों की बात नहीं करती। आजादी की लड़ाई को ही ले लो। हमारी बिरादरी की बहनों ने क्या कुछ नहीं किया। पर, इतिहास में हमारा जिक्र तक ढंग से नहीं किया गया। इसमें हमारी गलती नहीं, तुम्हारी ही कमजोरी झलकती है। मैं तो अपना काम कर गयी और आज भी शान से कहती हूं - मैं वेश्या हूं ! 
बुरा मत मानना, लेकिन मेरी तुलना तुम्हारे तथाकथित सभ्य समाज से क्या ? अब देखो ना, पिछले एक दशक से भी ज्यादा समय से तुम्हारा समाज सेक्स शिक्षा की सिर्फ बातें ही कर रहा है, मैं तो सदियों से दे रही हूं। अगर मुझ जैसी बहनों ने सुरक्षित यौन संबंध और एड्स जैसी बातों पर जोर ना दिया होता, तो तुम यमराज के घर चाकरी कर रहे होते। सच कहूं तो हमने ही तुम्हारे समाज को नरक में जाने से बचा लिया। हमारे रहने से तुम्हारे घर की बहूं-बेटियां काफी हद तक सुरक्षित हैं। तुम्हारी गंदगी काफी हद तक खुद में समेट लेती हूं। इसके बावजूद हमीं से मुहब्बत हमीं से लड़ाई ! 
नहीं तो यह क्या है ? आज हमारे पेट पर तुम्हारी बहू-बेटियां लात मार रही हैं। मैं तो कहती हूं, कोई काम छोटा नहीं होता। जो भी काम करो, पूरी ईमानदारी से। मुझे ही देखो, खुलेआम स्वीकारती हूं - मैं वेश्या हूं। यह नहीं कि घर से स्कूल-काॅलेज या आॅफिस जाने की बात कह निकली और पहुंच गयी थाना ! कल को अखबारों में तस्वीरें छप गयीं। दुपट्टे से मुंह ढकना पड़ा। मैं जो कुछ करती हूं, डंके की चोट पर। पुलिस, पत्रकार, नेता, डाॅक्टर, इंजीनियर, सैनिक, किसे नहीं जानती मैं। सभी को सलाम करती हूं। 
लेकिन यह क्या, इधर मुहब्बत का दावा करते हो और पीठ पीछे हमारी ही शिकायत ! मैंने तो न कहा था कि तुम मेरे पास आओ। अपनी पत्नी, बहन, मां को धोखा दो। मैं तो अबतक तुम्हारी लाज अपने माथे पर ढोती रही। तुम्हारे ‘पाप‘ को आंचल से ढक सिर्फ अपना नाम देती रही। तुम दगा करते रहे, मैं वफा करती रही। इतना सब जानकर भी हमीं से मुहब्बत हमीं से लड़ाई ! आखिर क्यों ?