COPYRIGHT © RAJIV MANI, Journalist, Patna

COPYRIGHT © RAJIV MANI, Journalist, Patna
COPYRIGHT © RAJIV MANI, Journalist, Patna

बुधवार, 22 अप्रैल 2015

यूं तो खत्म हो जाएगी पृथ्वी !

Kanchan Pathak
 22 अप्रैल, पृथ्वी दिवस पर विशेष 
 फीचर@ई-मेल 
कंचन पाठक 
आज प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति और आकार में दिनोंदिन इजाफा हो रहा है। मानव जीवन के लिए अमृततुल्य जल प्रदूषित होकर विषतुल्य बन विभिन्न व्याधियों और मृत्यु की वजह में तब्दील होता जा रहा है। हमारी प्राणाधार श्वासवायु जीवनदाई ना होकर प्राणघातक बीमारियों को ढोनेवाली महज बोझिल-सी विषैली हवा बन गई है। वसुंधरा की स्वाभाविक उर्वराशक्ति को जहरीले रसायन चाटकर बंजर बनाते जा रहे हैं। मौसम चक्र का रूप स्वरुप निरन्तर बदलता जा रहा है। गर्मी में बरसात और बरसात में सूखा पड़ रहा है। ग्रीनहाऊस गैस की बढ़ती मात्राओं के दुष्परिणाम स्वरुप वैश्विक तापमान उच्च से उच्चतर होता जा रहा है। आज दिग्भ्रमित मनुष्य जंगलों के जंगल काटता जा रहा है और बदले में कंक्रीट के जंगल उगाता जा रहा है। यह बिलकुल वैसा ही है, जैसे मनुष्य कुल्हाड़ी उठाकर स्वयं अपने ही हाथ-पैर काटने पर आमादा हो ! 
समुद्रतल दिन-प्रतिदिन ऊपर उठता जा रहा है, आर्कटिक ग्लेशियर पिघलकर अपना वजूद खोता जा रहा है। मिट्टी की घटती उर्वरता और प्रदूषित पर्यावरण की वजह से फसल की उत्पादकता घटती चली जा रही है। तो इस पृथ्वी के समस्त प्राकृतिक संसाधनों का उपभोग करनेवाले मनुष्यों का आखिरकार क्या दायित्व बनता है ? रूद्र के डमरू की अनुगूंज दूर कहीं से आनी शुरू हो गई है, अगर अब भी हम मनुष्यों की चेतना जागृत नहीं हुई, फिर क्या जब सर से पानी गुजर जायेगा हम उसके बाद जागेंगे ? और जब वक्त हाथ से निकल जायेगा तब जागकर भी क्या होगा ? 
द्वितीय विश्वयुद्ध के अंतिम चरण में जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर जो परमाणु बम गिराए गए थे और उससे हुई प्रलयलीला के परिणामस्वरुप रेडियोधर्मिता के जो घाव उत्पन्न हुए, वह इतने समयान्तराल पश्चात भी अबतक भर नहीं पाए हैं। स्वार्थ में अंधा मनुष्य अगर उस वक्त जरा सा भी दूरदृष्टि से काम लेता, तो ऐसा संवेदनाहीन कृत्य कभी ना करता। आज जब प्रदूषण बढ़कर अपने चरम पर जा पहुंचा है, मनुष्य अपनी दूरदृष्टि जागृत कर भविष्य की ओर क्यूं नहीं देखना चाहता? 
धरा का अस्तित्व समाप्तप्राय होने की ओर अग्रसर है। पृथ्वी कराह रही है और हम मनुष्य उस कराह को सुनकर भी समझना नहीं चाहते। जागरूक होते हुए भी जागना नहीं चाहते। आज पृथ्वी के कण-कण से प्रदूषण के विनाश की भयावहता दृष्टिगोचर हो रही है। अगर हम अब भी नहीं जागे, तो विनाश के जो भयानक बादल हमारे सर पर मंडरा रहे हैं, उससे ध्वस्त होकर सृष्टि के सम्पूर्ण मानवता की कहानी मात्र इतिहास बनकर रह जाएगी। इस भरीपूरी धरती का नामोनिशान शेष नहीं बचेगा। आज 22 अप्रैल, पृथ्वी दिवस के अवसर पर आइये हमसब धरती को बचाने का संकल्प लें और दूसरों को भी इस महत्वपूर्ण कार्य को करने के लिए प्रेरित करें। 
 परिचय : कंचन पाठक कवियित्री व लेखिका हैं। प्राणी विज्ञान से स्नातकोत्तर और प्रयाग संगीत समिति से हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में प्रवीण हैं। दो संयुक्त काव्यसंग्रह ‘सिर्फ तुम’ और ‘काव्यशाला’ प्रकाशित एवं तीन अन्य प्रकाशनाधीन। आपकी रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छपती रही हैं।