COPYRIGHT © RAJIV MANI, Journalist, Patna

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शुक्रवार, 3 अप्रैल 2015

कहीं दूसरे ग्रहवासी को मानव क्लोन तैयार करने न आना पड़े

राजीव मणि 
नित्य नये प्रयोग हो रहे हैं। नयी-नयी चीजें लोगों के बीच आ रही हैं। विभिन्न क्षेत्र में लगे वैज्ञानिक उत्साहित हैं। और उससे भी कहीं ज्यादा उपभोक्ता वर्ग। बात खुशी की है। लेकिन, उतनी भी नहीं जितनी लोग हो रहे हैं। कारण स्पष्ट है। ठीक उसी प्रकार कि एक पुत्र को मारकर दूसरे को जनने पर क्या खुश होना चाहिए ? एक चीज को बिगाड़कर दूसरी चीज को बनाने पर क्या गर्व महसूस करना चाहिए ? हर कोई शायद कहेगा - नहीं। लेकिन, क्या हम इस पर गंभीरता से विचार कर कुछ सकारात्मक कर रहे हैं। 
कलम से लेकर हवाई जहाज और फिर चाकू से परमाणु बम तक का आविष्कार आज हो चुका है। हाल के वर्षों में बाजार में एक नई चीज आई है। एक ऐसा टीवी सेट जो ना सिर्फ आपकी बात समझेगा, बल्कि आपके मनमाफिक कार्यक्रमों का चयन कर झटपट आपको दिखाएगा। वैज्ञानिक इसे बड़ी उपलब्धि बता रहे हैं और कह रहे हैं कि इससे बुजुर्ग एवं कमजोर दृष्टि वाले लोगों को काफी लाभ होगा। इस कार्यक्रम को ‘विस्ता परियोजना‘ के नाम से जाना जा रहा है। इसमें ‘बी स्काई बी‘ द्वारा सप्लाई किए जाने वाले इलेक्ट्राॅनिक कार्यक्रम गाइड्स को आवाज से जोड़ने वाली तकनीक एवं कृत्रिम आवाज के साफ्टवेयर तथा एनीमेड (भाषा) को साथ जोड़ने में करीब-करीब अठारह माह का समय लगा। दरअसल नए किस्म का यह टीवी सेट कम्प्यूटर से जुड़ा होता है। इस तकनीक में सारे प्रोग्राम पहले से कम्प्यूटर पर लोड होते हैं। जब कोई बोलता या संकेत देता है, तो यही कम्प्यूटर उसे समझ-पहचान कर स्वचालित ढंग से दर्शकों को उसका पसंदीदा कार्यक्रम दिखाता है। 
यह तो बात हुई एक आविष्कार की। लेकिन, इन आविष्कारों के पीछे पर्यावरण की जो प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष क्षति हो रही है उसका क्या ? किसी को इसकी चिन्ता है ! होना तो यह चाहिए कि जितनी जरूरत आज नई चीज को बनाने की है, उससे कहीं ज्यादा पर्यावरण को बचाने की आवश्यकता है। पर्यावरण की जो क्षति हो रही है, उस पर कुछ होता नहीं दिख रहा है। हां, हर वर्ष पर्यावरण दिवस एवं अन्य अवसरों पर करोड़ों खर्च अवश्य हो रहे हैं। प्लास्टिक कचरा एवं ओजोन परत की क्षति पर काफी पहले से हो-हल्ला होता रहा है। लेकिन सिर्फ हो-हल्ला ही। इधर बड़े-बड़े जंगल साफ हो गए। वृक्षारोपण के नाम पर हर वर्ष करोड़ों का वारा-न्यारा हो रहा है। कुछ ऐसे ही अन्य कारण और हैं जिसने अप्रत्यक्ष नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष रूप से धरती पर अपना असर डाला है। जीव-जंतुओं की सैकड़ों प्रजातियां इस धरती से सदा के लिए खत्म हो गयीं। वैज्ञानिकों का कहना है कि जो शेष हैं, इनमें से हजारों ऐसी प्रजातियां हैं, जिनका अगले तीन दशकों में पूरी तरह सफाया हो जाएगा। 
इधर वैज्ञानिकों का एक दल ऐसा भी है, जो विलुप्त हो चुके जीव-जंतुओं की क्लोनिंग बनाने में जुटा है। डायनासोर, सिमिटर हार्न, सोकारो डव, पीले सी हार्स आदि जंतुओं पर काम चल रहा है। इनका डीएनए भी एकत्र कर लिया गया है। लेकिन, यह बात शायद ही लोगों को हजम हो पाए कि एक ओर हम किसी प्रजाति को सदा के लिए मिटा दें और दूसरी ओर करोड़ों खर्च कर उस पर अनुसंधान करें। उसे फिर से जीवित करने का प्रयास किया जाए। पूर्व में कुछ जंतुओं की क्लोनिंग की जा चुकी है। लेकिन, परिणाम एकदम वैसे नहीं रहे, जिस स्थिति में वह प्रजाति थी। और तो और, बदलते वातावरण का स्पष्ट असर अब मानव जीवन पर भी देखने को मिल रहा है। समाज में बढ़ रही हिंसा और बदल रहे मानव स्वभाव एवं प्रकृति पर वैज्ञानिक पहले ही अपनी राय दे चुके हैं कि कहीं न कहीं मानव जीन प्रभावित हुआ है। मतलब खतरे की घंटी बज चुकी है। अब जरूरत यह है कि पर्यावरण को सुधारने पर ज्यादा ध्यान दिया जाए। सिर्फ गोष्ठी, संगोष्ठी, सेमिनार, चित्रकला प्रतियोगिता, वाद-विवाद, आदि कर नहीं, धरातल पर कुछ काम कर। वर्ना वह दिन दूर नहीं, जब मानव क्लोन तैयार करने दूसरे ग्रहवासी को इस धरती पर आना पड़ेगा।