COPYRIGHT © RAJIV MANI, Journalist, Patna

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मंगलवार, 7 अप्रैल 2015

भूत का चक्कर

 लघु कथा 
राजीव मणि
बात पश्चिम बंगाल के एक शहर की है। रात के दस बजे थे। एक व्यक्ति ने अपने घर की छत पर टहलते हुए पास की दीवाल पर एक छाया देखी। पहले तो उसने इसपर ध्यान नहीं दिया, लेकिन रोज-रोज इस छाया को देखने के बाद उसके अंदर डर बैठ गया। उसने इसे कोई भूत-प्रेत का चक्कर मान लिया। 
उस व्यक्ति से बात पूरे मुहल्ले में फैल गई। मुहल्ले के लोग रात दस बजे इस साक्षात भूत को देखने गली में जमा होने लगे। फिर रात में उस क्षेत्र से लोगों का आना-जाना भी बंद हो गया। 
घटनास्थल के ठीक सटे हुए घर के लोग सबसे ज्यादा भयभीत एवं परेशान दिख रहे थे। जब एक सप्ताह तक यह भूत का चक्कर खत्म नहीं हुआ, तो शहर का तांत्रिक बुलाया गया। उस तांत्रिक ने भूत भगाने के नाम पर लोगों से काफी पैसे लिए और पूजा करने के बाद यह कहकर चला गया कि कल से यह भूत यहां नहीं दिखेगा। मैंने इसे कैद कर लिया है। 
इसके बाद भी भूत का चक्कर खत्म नहीं हुआ। धीरे-धीरे बात पूरे शहर में फैल गई। शहर के कुछ साहसी लोग सच का पता लगाने सामने आये। काफी मुश्किल के बाद यह पता लगा कि यहां कोई भूत का चक्कर है ही नहीं। दरअसल रात दस बजे जब सज्जन अपने घर की छत पर टहलने आते थे, उसी समय कुछ दूरी पर एक और व्यक्ति अपनी छत पर खाना खाने के बाद टहल रहा होता था। उसके घर की छत पर एक तेज प्रकाश वाला बल्ब लगा था, जिससे उस महाशय की छाया यहां दीवाल पर पड़ रही थी। 
जब लोगों को सच्चाई का पता लगा, तो सभी अपनी मूर्खता पर हंसते रहे और फिर भूत का चक्कर लोगों की समझ में आ गया। 

मोती बाबू

‘‘आइये ..... आइये मोती बाबू ..... आपका ही इन्तजार था।‘‘ मोती बाबू को देखकर होटल के मैनेजर ने कहा। मोती बाबू एक सरकारी विभाग में पदाधिकारी हैं। कहते हैं न कि आदमी और घोड़ा कभी बूढ़ा नहीं होता, यह बात मोती बाबू पर पूर्णरूप से लागू होती है। ढलती उम्र में भी उनका मन बहलाना बंद नहीं हुआ। 
‘‘अरे क्या मोती बाबू ..... मोती बाबू कहते हैं। खाली हरा-हरा नोट गिनवा लेते हैं और सुंघने को बासी फूल देते हैं। बाजार में कोई नया फूल है तो बताइये। आपके बासी फूल से तो मेरा मन और दिमाग दोनों बीमार हो गया है।‘‘ मोती बाबू ने इशारे से इतराते हुए कहा। 
‘‘काहे आप चिन्ता करते हैं। अरे, आपके लिए तो हम इसबार बोन्साई पौधा की व्यवस्था किये हैं। यह देखने में छोटा है, लेकिन फल बड़ा-बड़ा और काफी मीठा है। एकबार खाइयेगा तो हमेशा यही मांगियेगा।‘‘ मैनेजर ने अपने ग्राहक पर चारा फेंका। 
मोती बाबू यह बात सुनकर अंदर ही अंदर काफी प्रसन्न हुए - ‘‘कहीं कैक्टस का पौधा तो नहीं है जी ?‘‘ 
‘‘अरे नहीं भाई। बिल्कुल रसभरी .....।‘‘ मैनेजर ने यह कहकर राहत की सांस ली। ‘‘अजी मैं तो जांच-परख कर ही आपकी सेवा के लिए रखा हूं।‘‘ मैनेजर ने थोड़ी आग और लगा दी। 
मोती बाबू अब पूरे मूड में आ गए। मैनेजर की बात सुनकर अब वे और प्रतिक्षा नहीं कर सकते। ‘‘भेजिए जल्दी‘‘ यह कहकर मोती बाबू होटल के एक कमरा में समा गये। 
थोड़ी देर बाद शार्ट स्कर्ट तथा कमीज पहने एक कमसीन लड़की अपने हाथ में एक ट्रे लिए अंदर प्रवेश करती है। मैनेजर मोती बाबू को थोड़ा और तड़पाना चाहता था, इसलिए उसने उस लड़की के चेहरे पर एक ओढ़नी रख दी थी। ट्रे में शराब की बोतल, एक जग पानी और गिलास था। 
मोती बाबू एकदम उतावले हो रहे थे। जैसे ही लड़की अंदर पहुंची, उन्होंने दरवाजा बंद कर लड़की को अपनी बाहों में खींच लिया और एक ही झटके में ओढ़नी दूर जा गिरी। 
फिर तो ...... जो जहां था, वहीं जैसे मूर्ति बन गया हो। ‘‘यह तो पायल है।‘‘ मोती बाबू के मुंह से निकल पड़ा। अपनी ही बेटी को सामने देख मोती बाबू के पैरों तले की जमीन खीसक गई। वे इतनी तेजी से वहां से भागे कि कुछ होश ही नहीं रहा। सड़क पर वे दौड़े जा रहे थे। पीछे से होटल के गेट पर खड़ा मैनेजर चिल्ला रहा था -- मोती बाबू ! मोती बाबू !!