COPYRIGHT © RAJIV MANI, Journalist, Patna

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सोमवार, 6 जुलाई 2015

कहीं सरस्वती की तरह विलुप्त ना हो जाए नदियां

Kanchan Pathak
 फीचर@ई-मेल 
कंचन पाठक 
दृश्य 1 
स्थान - गंगा का सुनसान तट, समय - मध्यरात्रि 
एक युवक जीवन की विषमताओं और दुखों से टूटकर आत्महत्या के इरादे से आधी रात को गंगा तट पर आता है। चांदनी रात में लहरों के धुंधले उजास में देखता है, नदी के तट पर एक स्त्री सफेद वस्त्र में घुटनों में सर छुपाये बैठी है। वह शायद रो रही थी। हिचकियों के बीच मद्धम रूदन स्वर से उसका शरीर कांप रहा था। लड़का उसे देखकर चकित और अचंभित हो जाता है। वह स्त्री के करीब पहुंचता है। इतने में स्त्री अपना सर ऊपर उठाती है। उसका चेहरा आंसुओं से भीगा हुआ था। आंखों में करुणा का असीम सागर लहरा रहा था। उसने लड़के की ओर वात्सल्य दृष्टि से देखा और पूछा - इतनी रात गए तुम यहां क्या कर रहे हो ? 
लड़का - मैं जीवन की विभीषिकाओं और विषमताओं से टूट चुका हूं। मां गंगा की मोक्षदायिनी गोद में शरण लेने आया हूं। इस संसार की विद्रूपताओं से अब यही मुझे मुक्ति दिला सकती है। किन्तु आप कौन हैं ? और इतनी रात गए यहां अकेली बैठकर क्यूं रो रही हैं ? वह कौन-सी पीड़ा है जिसने आपको इस तरह व्यथित कर दिया है ? आपके घर के लोग कहां हैं ? आप मुझे बताएं ... मैं यथासंभव आपकी मदद करूंगा। आप उठिए और मेरे साथ चलिए, मैं आपको आपके घर तक पहुंचा कर आता हूं। इतनी रात गए एक अकेली स्त्री का ऐसे सुनसान जगह पर रहना ठीक नहीं है। आइये चलिए मेरे साथ।
युवक प्रस्थान की भूमिका में तत्पर दिखता है। 
स्त्री - मैं गंगा हूं। हजारों वर्ष पूर्व भागीरथ ने कठिन तप कर स्वर्गलोक से मृत्युलोक में आने के लिए मुझे राजी किया था। तब से अब तक मैं पृथ्वी वासियों को अपने स्वर्गिक आंचल की छांव देकर असीम स्नेह, प्रेम और उर्जा लुटाती छलकाती आ रही हूं। किन्तु, बदले में इन पृथ्वी वासियों ने कल-कारखानों के वर्ज्य समेत अपने समस्त कूड़ा कर्कट मुझमें बहाकर मेरे स्वच्छ आंचल को दागदार और विवर्ण कर दिया है। आज दो करोड़ नब्बे लाख लीटर प्रदूषित कचड़ा रोजाना मुझमें गिराया जा रहा है। यही नहीं, आस्था के नाम पर ये लोग मनुष्यों और पशुओं की लाशें तक मुझमें बहा देते हैं। आह! अब तो मुझे सांस लेने में भी परेशानी होती है। मेरा दम घुट रहा है। वहीं दिल्ली के 56 फीसदी लोगों की प्यास बुझा कर जीवन देने वाली मेरी बहन यमुना का जीवन आज स्वयं ही संकट में घिरा हुआ आखिरी सांसें ले रहा है। इसी प्रकार पृथ्वी पर बढ़ते पापों से मैली होकर मेरी बहन सरस्वती, जो आज से करीब 5500 वर्ष पहले मेरी ही भांति एक विशालकाय और पूर्ण प्रवाह के साथ बहने वाली अमृतदायिनी नदी थी, विलुप्त हो गई। वह सरस्वती जिसे मात्र एक नदी तो कदापि नहीं कह सकते, पौराणिक हिन्दू ग्रंथों और वैदिक ऋचाओं में नदीतमा की उपाधि से अटी पड़ी ये नदी निर्विवाद रूप से प्राचीनतम भारतीय सभ्यता की उद्गम स्थली भी थी। मानवता को कलंकित करते हुए महाभारत में जो खून की नदियां बही, उन छींटों के दर्द का कलंक लिए आकुल व्याकुल होकर मेरी बहन इस धरती से विदा हो गई। उस समय भी ऋषि वशिष्ठ ने सरस्वती में प्रवाह छोड़ने वाली सतलुज के जल में कूदकर आत्महत्या का प्रयास किया था, जिसकी पीड़ा से व्याकुल होकर नदी की धारा 100 खण्ड धाराओं में टूट गई थी। आज तुम भी तो वही करने आए थे। अब शायद मुझे भी अपनी बहनों की तरह इस भारत भूमि का त्याग कर देना चाहिए। 
युवक ध्यान से गंगा की व्यथा को सुनता है। भाव-विह्वलता की अवस्था में उसकी आंखों से आंसुओं की धारा बह निकलती है। 
युवक अपने दोनों हाथ जोड़कर नदी से कहता है - क्षमा माते। मैं समस्त पृथ्वी वासियों की तरफ से आपसे क्षमा मांगता हूं। और युवक उसी वक्त से नदी की सफाई में जुट जाता है। 
दृश्य 2 
समय - सुबह के 7 बजे, स्थान - गंगातट 
सुबह हो जाती है। अपने काम में मशगूल युवक को पता नहीं चलता। वह मग्न होकर नदी की सफाई में लीन है। उसके साथियों का फोन आता है। युवक की विचार तन्द्रा भंग हो जाती है। उसके मित्र उसे ढूंढते हुए वहां पहुंचते हैं। युवक से घर चलने को कहते हैं। वह अपने साथियों को सब बताता है। 
युवक - आज से मेरे जीवन का एक ही लक्ष्य है। मैं अपने भारत भूमि की इस मोक्षदायिनी नदी को सरस्वती की भांति रूठकर नहीं जाने दूंगा। मैं प्रतिदिन कुछ घंटे अपनी प्यारी मां गंगा के आंचल से धब्बों को साफ करने में बिताऊंगा। 
सभी साथी एक स्वर में - तुम इस काम में अकेले नहीं हो मेरे दोस्त। हमसब तुम्हारे साथ हैं। यह केवल एक नदी नहीं, हमसब पृथ्वी वासियों की आत्माओं की आस्था भी है। 
इस तरह सभी अपने-अपने कामों से कुछ वक्त निकालकर नदी को स्वच्छ करने में समर्पित करते हैं। 
अंतिम दृश्य 
नदियों का इतिहास केवल स्वयं उनका इतिहास नहीं होता, बल्कि यह अनगिनत सभ्यताओं का इतिहास होता है। सो नदियों का संरक्षण हर मनुष्य का परम उत्तरदायित्व होता है। हमसब जानते हैं, नदियों का पानी जहां-जहां से गुजरता है, वहां की मिट्टी को उर्वरा बना जाता है। परन्तु, आज जब नदियां स्वयं ही प्रदूषण के प्रहार से ग्रस्त हैं, तो जमीन बंजर ही बनेगी ना! सो अगर मानव जाति के अस्तित्व की जमीन को बचाना चाहते हैं, तो आइये हमसब मिलकर अपनी नदियों को बचाएं। 
 परिचय : कंचन पाठक कवियित्री व लेखिका हैं। प्राणी विज्ञान से स्नातकोत्तर और प्रयाग संगीत समिति से हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में प्रवीण हैं। दो संयुक्त काव्यसंग्रह ‘सिर्फ तुम’ और ‘काव्यशाला’ प्रकाशित एवं तीन अन्य प्रकाशनाधीन। आपकी रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छपती रही हैं।