COPYRIGHT © RAJIV MANI, Journalist, Patna

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शनिवार, 17 अक्तूबर 2015

उच्चैठ कामना भगवती स्थान

Kanchan Pathak
 फीचर@ई-मेल 
नवरात्र पर विशेष
कंचन पाठक
अखिल ब्रह्माण्ड की सम्पूर्ण सृष्टि में जहां कहीं भी स्वयम् का उत्सर्ग कर रचनाशीलता का उल्लास है, सृजनशीलता की चेतना का विशिष्ट स्फुरण है, उस सूक्ष्म से सूक्ष्मतर और वृहद् से वृहद्तर स्थान पर स्त्रीतत्व की उपस्थिति अनवरत मौजूद है। स्त्रीतत्व - प्रकृति, शक्ति ... जननी। जहां वह सृजनमयी, संसृति को रचनेवाली कामेश्वरी, ललिता, भुवनमोहिनी है, तो रौद्रात्मिका, कुष्मांडा, छिन्नमस्तिका और कालरात्रि भी है। तथापि सृष्टि की रचना, संचालन और संहार करनेवाली उस शक्तिनी का ह्रदयसागर इतना स्निग्ध और उदार है कि वह एक ही मृदुल स्मित पर पलभर में बिक जाती है, तो एक ही मीठी मनुहार पर वहीं, उसी स्थान पर सदा-सदा के लिए टिक जाती है । 
देवी सती का बांया कन्धा मिथिला प्रदेश में गिरा था। इसी कारण सम्पूर्ण मिथिलांचल को शक्तिपीठ के रूप में मान्यता प्राप्त है। (मिथिलायां महादेवी वाम स्कन्धे महोदरः - तन्त्र चूड़ामणि) मिथिला के अनेक शक्तिपीठों में एक प्रमुख पीठ है - उच्चैठ कामना भगवती स्थान। नेपाल और बिहार की सीमा पर बेनीपट्टी अनुमंडल से पांच किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित यह शक्तिपीठ थुम्हानी नदी के किनारे उच्चैठ नामक गांव में स्थित है जहां समस्त मनोकामना पूर्ण करने वाली जगत जननी, देवी छिन्नमस्तिका स्वयम् विराजित हैं। विगत में यहां घना जंगल हुआ करता था, जिस कारण ये वनदुर्गा भी कहलाती हैं। मंदिर में अवस्थित काले रंग की शिला पर उत्कीर्ण छिन्नमस्तिका की मूर्ति अनुमानतः चैथी-छठवीं शताब्दी के आसपास की है। मंदिर से सटे सरोवर के पूर्व श्मशान है, जहां आज भी तन्त्र-साधक साधना में लीन रहते हैं। वह अगोचर शक्ति या कहें अव्यक्त ऊर्जा इस पीठ के कण-कण में व्याप्त है। शारदीय नवरात्र में श्रृंगारपूजा के बाद देवी के दर्शन को अत्यन्त मंगलकारी माना जाता है। इस शक्तिपीठ से विश्व-कवि कालिदास की वृहद् स्मृतियां जुड़ी हुई हैं। काली या कालिया को कालीदास बनाने वाली उच्चैठ चतुर्भुजा की प्रसिद्धि व आस्था न केवल मिथिलांचल, बल्कि नेपाल में भी है। जिस स्थान पर रहकर कालिदास ने देवी की साधना की थी, वह कालिदास-डीह के नाम से जानी जाती है। यहां पूजन के लिए आनेवाले लोगों में जिनके घर पढ़ाई करनेवाले बच्चे होते हैं, वे कालीदास डीह से मिट्टी ले जाकर बच्चों के पढ़नेवाले कमरे या अपने पूजास्थल पर रखते हैं। 
जनश्रुतिओं, लोक-कथाओं एवं पौराणिक तथ्यों के आधार पर कालीदास का जन्म एक गरीब परिवार में हुआ था। वह आरंभ में अनपढ़ और मुर्ख थे। काशी-नरेश विक्रमादित्य की पुत्री विद्योत्तमा परम विदुषी एवं अनिंद्य सुन्दरी थी। विद्योत्तमा ने प्रतिज्ञा की थी कि जो पुरुष उसे शास्त्रार्थ में पराजित करेगा, वह उसी से विवाह करेगी। कितने ही विद्वान विद्योत्तमा से विवाह की लालसा लेकर आते, पर शास्त्रार्थ में उससे हार जाते। इस बात से कुण्ठित होकर कुछ विद्वानों ने साजिशन कालिदास को विद्योत्तमा के समक्ष प्रस्तुत कर ये कहा कि यह एक प्रकाण्ड विद्वान हैं, जोकि आपसे मौन शास्त्रार्थ के इच्छुक हैं। उन सबों ने महामूर्ख कालीदास को पहले ही मुंह खोलने से मना कर रखा था। विद्योत्तमा शास्त्रार्थ के लिए तैयार हो गई। उसने कालीदास की ओर अपनी हथेली करके पांचों ऊंगलियां खोल कर दिखाई अर्थात् यह शरीर पंचतत्व निर्मित है। मुर्ख कालीदास को लगा कि विद्योत्तमा उन्हें थप्पड़ दिखा रही है, उसने तुरन्त ही उसे मुट्ठी को मुक्के की शक्ल में बांधकर दिखाया ... विद्वान पण्डितों ने तत्काल विद्योत्तमा से कहा कि ये कह रहे हैं कि - भले ही शरीर पंचतत्व से निर्मित है, परन्तु मन के अधीन और मन द्वारा संचालित है। इस प्रकार कुछ और प्रतिप्रश्न और प्रतिउत्तरों के पश्चात विद्वानों ने कालीदास को विजयी घोषित कर दिया। विवाह सम्पन्न हो गया ... किन्तु विवाह उपरान्त विद्योत्तमा फौरन ही समझ गई कि उसके साथ धोखा हुआ है, कालीदास मूर्ख और निरक्षर है। तब उसने कुपित होकर कालीदास को यह कहकर कि - ऐसे मूर्ख का मैं मुख भी नहीं देखना चाहती, धिक्कारते हुए अपमानित करके घर से निकाल दिया। दुःख, लज्जा, पीड़ा और आघात से दग्ध होकर कालीदास आधी रात को उसी समय वहां से चल दिए। चलते-चलते वह घने वन में जा पहुंचे ... जहां अवस्थित एक गुरुकुल पर उनकी निगाह गई। गुरुकुल से पूर्व दिशा में उच्चैठ छिन्नमस्तिका भगवती का मंदिर और मंदिर तथा पाठशाला के बीच थुम्हानी नदी ... पत्नी द्वारा ठुकराया गया, भूखा प्यासा, थका हारा मुसाफिर वहीं ठहर गया। कालिदास ने वहीं रहकर देवी की घोर तान्त्रिक उपासना की। भाद्रपद मास में नदी में बाढ़ आई, जल की धारा अत्यंत तीव्र हो गई। कई दिनों से लगातार होती तेज वर्षा रुकने का नाम नहीं ले रही थी, ऐसे में भी कालीदास बिना आगे पीछे सोचे उफनती नदी को तैरकर मंदिर पहुंच जाते और सारी रात साधना जारी रखते। अन्ततः प्रसन्न होकर भगवती साक्षात् प्रकट हुईं और कालीदास से वर मांगने को कहा ... विद्योत्तमा से तिरस्कृत कालीदास ने विद्या-दान की याचना की और मां भगवती ने तथास्तु कहकर ये कहा कि आज रात्रि भर में तुम जिस भी पुस्तक या पृष्ठ को छू लोगे, वह तुम्हें कंठस्थ हो जायेगी। ऐसा कहकर माता अंतर्ध्यान हो गयीं। कालीदास उफनाई हुई थुम्हानी नदी को तैरकर वापस गुरुकुल में आए, जहां वह दिन में शिक्षार्थियों के लिए खाना बनाने का काम करते थे और सारी रात विद्यार्थियों की समस्त पुस्तकों को बारी-बारी से स्पर्श करते रहे। भगवती के वरदान से वही मुर्ख कालिदास विश्व पटल पर अद्वितीय विद्वान बनकर उभरे एवं कुमारसंभवम, मेघदूतम, रघुवंशम समेत अनेक अमर काव्यग्रंथों की रचना की। मंदिर से कुछ ही दूरी पर अवस्थित कालिदास-डीह (डीह का शाब्दिक अर्थ है - निवास-स्थान) जहां रहकर कालिदास ने बाद में अनेक ग्रंथों की रचना की थी, में आज भी कालिदास के जीवन और ग्रन्थ-सम्बन्धित अनेक चित्र व मूर्तियां उत्कीर्णित हैं। कालान्तर में गुरुकुलों के विलुप्त होने के बाद संस्कृत गुरुकुल तो अब यहां नहीं रहा, पर एक स्कूल अभी भी यहां चलता है। नगर के कोलाहल से दूर प्रकृति की शान्त गोद में अवस्थित कालिदास डीह पर आज भी प्रतिदिन भजन, कीर्तन एवं आख्यानों के आयोजन होते रहते हैं। वैसे तो अंग्रेजों ने हम पर और हमारे देश पर बहुत अत्याचार किये, पर कहीं न कहीं उनके शाषण-तन्त्र में एक अनुशासन, एक कठोरता भी थी और इसी वजह से कोई देखवैया या दावा करने वाला नहीं होने के बावजूद यह डीह आज भी सरकारी रूप से कालीदास के नाम पर ही है। हुआ यूं कि अंग्रेजी राज में जब जमीन की नाप-जोख कर बही खाते में जमीन मालिक के नाम चढ़ाए जा रहे थे, तो इस जमीन पर दावे के लिए कोई आगे नहीं आया। पूछताछ करने पर पता चला कि जमीन कालीदास की है जो विगत में यहां रहते थे, तब बेईमानी वाली बंदरबांट या सरकारी जमीन घोषित करने की बजाय अंग्रेज अधिकारियों ने जमीन को कालिदास के नाम पर ही रहने दिया, जो कि अब तक भी है।  बस एवं सड़क मार्ग द्वारा पूरे बिहार एवं नेपाल तराई से यहां आवागमन की सुविधा मौजूद है। शारदीय नवरात्र में समूचे बिहार, बंगाल, झारखण्ड एवं नेपाल से साधक यहां पहुंचते हैं। भगवती छिन्नमस्तिका की पूजा उपरान्त संसार की समस्त बाधाएं पीछे छूट जाती हैं।
 परिचय : कंचन पाठक कवियित्री व लेखिका हैं। प्राणी विज्ञान से स्नातकोत्तर और प्रयाग संगीत समिति से हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में प्रवीण हैं। दो संयुक्त काव्यसंग्रह ‘सिर्फ तुम’ और ‘काव्यशाला’ प्रकाशित एवं तीन अन्य प्रकाशनाधीन। आपकी रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छपती रही हैं।