COPYRIGHT © RAJIV MANI, Journalist, Patna

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शुक्रवार, 11 दिसंबर 2015

बदलाव और हमारा समाज

 मजाक डाॅट काॅम 
 11 
राजीव मणि
बदलाव प्रकृति का नियम है। लेकिन, किसी को क्या पता था कि पिछले दो दशक में बदलाव की ऐसी हवा बहेगी कि प्रकृति का नियम ही बदल जायेगा। विश्वास ना हो, तो असंतुलित हो चुके पर्यावरण और शोर मचाते लोगों को देखिए ! सभी जान रहे हैं कि खतरा कितना भयावह है और ऐसे में क्या करना चाहिए। फिर भी भाषण और बड़े-बड़े कार्यक्रमों के अलावा भी कुछ हो रहा है क्या ? पिछले दो दशक ने बनते-बिगड़ते कई समीकरणों को देखा है। कई-कई ‘अणुओं’ को एक ‘परमाणु’ में समाते भी ! जी हां, टेलीफोन, पेजर, फैक्स, कैमरा, कम्प्यूटर, इन्टरनेट, अखबार, पत्रिका, चिट्ठी-पत्री, और ना जाने क्या-क्या, सिर्फ एक स्मार्ट फोन में सिमट कर रह गये। आप इसे अणुओं को एक परमाणु में समाते नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे। मैं तो समझता हूं, पूरा का पूरा ब्रह्माण्ड ही कैद हो गया है। 
इसी दो दशक में जंगलराज, सुशासन और अच्छे दिन आये या नहीं ? और इसी दो दशक में मैं अपनी इकलौती पत्नी का पति बना और फिर बाप भी। मुझे याद है, राह चलती लड़कियों के छिड़ जाने की खबरें जब अखबारों में खूब छपने लगीं, उन्हीं दिनों मैं बाप बनने वाला था। तब एकांत के क्षणों में हम पति-पत्नी रोमांच की बातें नहीं, इस बात पर माथापच्ची किया करते थे कि अगर लड़की होगी तो उसका क्या नाम रखा जायेगा और लड़का हुआ तो क्या। रोज फुरसत में हमारी संसद लगती, चरचा होती और बिना किसी नतीजा के हो-हंगामा के साथ संसद खत्म हो जाती। एक-एक दिन कर कई ‘विशेष सत्र’ बेनतीजा गुजर गए। बात ना बनता देख मैंने ही कहा था, ‘‘जानेमन, अगर लड़की हुई तो उसका नाम दीदी और लड़का हुआ तो बाबू रखेंगे।’’ 
मुझे याद है, तब यह सुनकर मेरी पत्नी काफी नाराज हुई थी। उसने कहा था, ‘‘दीदी और बाबू भी कोई नाम है। इससे अच्छा तो मम्मी और पापा रखते।’’ उसने मुझपर व्यंग्य कसा था। 
लेकिन, दीदी और बाबू नामकरण के पीछे के रहस्य को समझाने में मुझे पूरे एक सप्ताह लग गये। आखिर वह मान गयी। ईश्वर की कृपा बरसी। दीदी और बाबू, दोनों, आ गये। आज दीदी चैदह साल की है और बाबू पन्द्रह का। अपने बच्चों के ऐसे नाम रखने के फायदे अब साफ-साफ दिखने लगे हैं। मुहल्ले के आवारा छोकड़े दीदी को देखते ही रास्ता बदल लेते हैं। कोई उससे कुछ कहता नहीं। कुछ ही मरद हैं, जो उसका नाम लेकर सम्मान के साथ पुकारते हैं। और जहां तक सवाल बाबू का है, तो बिहार में छोटे बच्चों को लोग प्यार से बाबू पुकारते हैं। एक दूसरा अर्थ भी है। कुछ लोग बाप को भी यहां बाबू कहते हैं। 
खैर छोडि़ए, मजाक ही मजाक में यह क्या मैं अपनी बात लेकर बैठ गया। आइए, कुछ सामाजिक बदलाव की बात करें। मेरे पड़ोस में ठाकुर साहब नये-नये आये थे। अपनी मूंछ पर ताव देते हुए खुद को क्षत्रिय बतलाते थे। काफी रौब था ठाकुर साहब का। एकदिन उनके पुत्र को नौकरी के लिए आवेदन-पत्र भरना था। जाति वाले काॅलम में उसने नाई भरा। फाॅरम भरते हुए उसके एक मित्र ने देख लिया। फिर क्या था, पूरे मुहल्ले में बात फैल गयी। ठाकुर साहब क्षत्रिय नहीं, नाई जाति से हैं। लोग कहने लगें, इसमें छुपाने की कौन-सी बात थी। क्या झूठे सम्मान के लिए कोई जात-धरम बदल लेता है ? कोई कहता, जब आरक्षण के फायदे की बात आई, ठाकुर साहब नाई बन गये ! 
लोग चरचा करने लगें, अपने प्रधानमंत्री मोदी साहब को देखिए। लोकसभा चुनाव से पहले ही उन्होंने लोगों से साफ-साफ कह दिया - मैं तो चाय बेचनेवाला का बेटा हूं। मैं भी अपने पिता जी के साथ रेलवे स्टेशन पर चाय बेचता था। उन्होंने पूरे विश्वास के साथ सच कहा। लोगों ने उनके सच बोलने की साहस का कद्र किया और वे देश भर में भारी संख्या बल के साथ चुनाव जीते। दूसरी तरफ बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री मांझी साहब को देखिए। उन्होंने मुख्यमंत्री रहते कहा था - मैं मुसहर जाति से हूं और कई बार चूहा भी खा चुका हूं। पूरा बिहार मांझी साहब की इस सादगी का कायल हो गया। 
अब बताइए, इतना सबकुछ देखने-सुनने के बाद भी ठाकुर साहब को झूठ बोलने की क्या जरूरत थी। आखिर झूठ बोलने से उन्हें मिला क्या ? अब अपना मुंह छिपाते चल रहे हैं। 
खैर, बात बदलाव की हो रही है, तो अपने केजरीवाल भैया की बात भी कर लें। दूसरी बार दिल्ली विधानसभा पहुंचने के बाद तो ऐसे बदले कि अब वे पहचान ही नहीं आ रहे हैं। लोग तो समझ रहे थे कि राजनीति में आकर एक नया इतिहास रचेंगे। देश भर के राजनेताओं के लिए एक मिशाल कायम करेंगे। इतिहास के पन्नों में कोई ‘सुन्दर अध्याय’ जुड़ेगा। लेकिन, लोगों को मायूसी हाथ लगी। अब तो लोग कहने लगे हैं कि राजनीति में चाहे कोई भैया आ जायें, राजनीति सबको बदल देगी। वैसे राजनीति में कुछ लोग सुबह कुछ, दोपहर को कुछ और रात में किसी और ही रंग में होते हैं। दरअसल राजनीति का मैदान एक अच्छा प्रयोगशाला रहा है। जो जी में आए बोलिए ! जब बवाल मचे, तो मुकर जाइए - मैंने तो नहीं कहा था जी ! सब मीडिया वालों की शरारत है। 
इन्हीं दो दशक में भारतीयों के पहनावे काफी बदल गये। और इसमें लड़कियां लड़कों से बाजी मार ले गयीं। भारतीय बालाएं यूरोप का नकल करती रहीं, यूरोप की बालाएं भारत का। मेरे एक मित्र यह सब ज्ञान मुझे अपने ही मुहल्ले की नुक्कड़ पर बांट रहे थे। पास ही एक आवारा टाइप का लड़का खड़ा था। उसने बीच में टपक लिया, ‘‘सर, अब यही देखना बाकी रह गया है कि सुदूर क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासियों के पहनावे की नकल करने में भारत के किस प्रदेश की लड़कियां बाजी मार ले जाती हैं। हमलोग तो अपने मुहल्ले की समिति की ओर से उन्हें देने को मेडल लिए बैठे हैं। आखिर ऐसी वीर लड़कियों को मेडल देने के बाद साथ में एक सेल्फी लेने का हक तो बनता है ना ?’’ 
मैंने अपने मित्र को इशारा किया, ‘‘चलिए, मुझे ठंड लग रही है।’’ उन्होंने हंसकर पूछ लिया, ‘‘क्या तबीयत खराब है ? कुछ लेते क्यों नहीं।’’ मेरे मुंह से यूं ही निकल गया, ‘‘लेते-लेते ही तो यह हाल हुआ है।’’ मित्र हंस पड़े और अपनी राह चल दिए। मैं भी ठंड से बेहाल अपने घर लौट आया।