COPYRIGHT © RAJIV MANI, Journalist, Patna

COPYRIGHT © RAJIV MANI, Journalist, Patna
COPYRIGHT © RAJIV MANI, Journalist, Patna

मंगलवार, 5 जनवरी 2016

भूख और भुक्खड़ !

 मजाक डाॅट काॅम 
 12 
राजीव मणि 
भूख सबको लगती है। कभी किसी को भूखा देखकर आपको दया आ सकती है। कभी घृणा भी हो सकती है। और कभी, हो सकता है, आप उस भुक्खड़ से नफरत की कर बैठंे। कारण साफ है, इस भूख के कई रंग-रूप हैं। मैं इससे जुड़ी ही कुछ घटनाएं बताता हूं। एकबार मैं ट्रेन के इन्तजार में घंटों रेलवे स्टेशन पर था। मेरे पास ही एक सज्जन खड़े थे। उन्होंने वेंडर से कचैड़ी-भुजिया का एक पैकेट खरीदा। मजे ले-लेकर खाने लगें। एक भिखाड़ी खाते हुए उन्हें गौर से देख रहा था। दूसरी ओर एक कुत्ता भी उन्हें खाता देख लाड़ टपका रहा था। दो-तीन कचैडि़यां खाकर महाशय वहीं एक कोने में कचैड़ी-भुजिया का पैकेट फेक देते हैं। जैसे ही वे पैकेट फेकते हैं, एक ओर से भिखाड़ी और दूसरी ओर से कुत्ता उस पैकेट पर झपटते हैं। और इस झपटा-झपटी में भिखाड़ी को कुछ नहीं मिलता, पूरा पैकेट अपने मुंह में दबाकर कुत्ता चल देता है। भूख मिटाने की इस दौड़ में मनुष्य हार जाता है, जानवर जीतता है। तब मुझे उस भिखाड़ी पर काफी दया आयी थी। मेरी पूरी यात्रा भूख से लड़ते-हारते उस और उस जैसे इन्सान के बारे में सोचते ही निकल गयी। 
अब एक दूसरी घटना के लिए आपको दक्षिण भारत लिए चलता हूं। बात मंदिर के बाहर बैठकर भीख मांगते एक भिखाड़ी की ही है। कई वर्षों से वह उस मंदिर के बाहर ही भीख मांगा करता था। भक्तजन लौटते वक्त उसे पैसे भी खूब दिया करते थे। लेकिन, वर्षों तक उसकी हालत जस की तस रही। वह मांग कर कुछ भी खा लेता। किसी तरह अपना पेट भर लेता। मांग कर ही चिथड़े पहन-ओढ़ लेता ! 
एक दिन तो गजब ही हो गया। एक छोटे से समाचार पत्र में उसकी खबर छपी। वैसे भी भिखाडि़यों की खबर बड़े अखबारों में कहां छपती है ? खैर, पता चला कि उस भिखाड़ी ने भीख मांगकर अबतक दस लाख रुपए जमा कर रखे थे। और सबके सब रुपए उसने एक अनाथालय को दान में दे दिये। सच कहता हूं, उस दिन ईश्वर से पहले उस भिखाड़ी के आगे मेरा सिर झुका था। मैं कई दिनों तक सोचता रहा, इस विशाल देश में कैसे-कैसे भिखाड़ी हैं। कोई झोपड़ी में रहकर भी देश के अनाथ बच्चों के बारे में सोचता है। कोई महल में रहकर भी अनाथ बच्चों के फंड के गबन के बारे में ! 
सब की अपनी-अपनी भूख है। किसी को पेट की भूख, किसी को नाम कमाने की भूख, किसी को दया-करुणा की भूख, किसी को तन की भूख, किसी को मन की भूख, किसी को साहित्य की भूख, किसी को सांस्कृतिक भूख, किसी को पैसों की भूख। और भी कई ऐसी चीजें हैं, जिसकी भूख प्रायः लोगों को होती है। भूख जब हद से ज्यादा बढ़ जाये, तो पता ही नहीं चल पाता कि कब वह हवस में बदल गयी ! अब दो घटनाओं को एकसाथ देखें, फर्क साफ-साफ नजर आएगा। आपने बुंदेलखंड के एक गांव के लोगों को घास की रोटी और जंगली पत्तों की सब्जी बनाकर खाते हुए टीवी पर देखा होगा। दूसरी तरफ जानवरों के करोड़ो रुपए के चारा को बंगले में रहने वालों ने कब पचा डाला, किसी को भनक तक नहीं लगी। लोगों को पता तो तब चला, जब बंगले से पचा हुआ चारा ‘गोबर’ बनकर निकला। आप इसे क्या कहेंगे ? 
अब देखिए ना, शर्मा जी को काफी अरसे से साहित्य के क्षेत्र में बहुमूल्य योगदान के लिए सम्मानित किये जाने की भूख थी। काफी छक्के-पंजे किये, किसी के पांव पकड़े, किसी को दारु-मुरगा की पार्टी दी, किसी को शराब-शबाब का चस्का था, वह भी पूरी किये, पर बात न बनी। अंत में दस हजार रुपए में सेटिंग करनी पड़ी। वह भी जिला स्तर पर एक छोटे से सम्मान के लिए ! इसके बाद तो वह कहते नहीं थकते थे, राष्ट्रीय पुरस्कार तो आजकल नेताओं की चापलूसी से मिलते हैं जी। 
कभी-कभी यह भी देखा गया है कि भूख अचानक ही लगती और सेकण्ड भर में हवस में बदल जाती है। पटना की ही बात बताता हूं। दशहरा का समय था। लोग गांधी मैदान में हर साल की तरह रावण वध देखने गए थे। रावण वध कार्यक्रम के बाद अचानक भगदड़ मच गयी। देखते ही देखते लोग लाश में बदलने लगें। कुछ लोग बचाव कार्य में जुटे, कुछ लाशों से गहने-पैसे लूटने में। सच कहता हूं, तब इन ‘भुकखड़ हवसी’ के सामने रावण वध कार्यक्रम एक मजाक-सा ही लगा था। वैसे भी रावण राज में लंका में इस तरह की घटना की चरचा कहीं नहीं है। 
वैसे चलते-चलते आपको यह भी बता दूं कि कभी-कभी कोई व्यक्ति भूखा नहीं होता, फिर भी भुक्खड़-सा व्यवहार करता है। दरअसल यह एक गंभीर बीमारी है, जो उसके खून के हर बूंद में फैल चुकी होती है। विश्वास ना हो तो यह घटना सुन लीजिए। वर्मा जी एक बड़े अखबार में फीचर डेस्क के प्रभारी थे। प्रेस से मोटी सैलेरी पाते थे। हर वक्त आॅफिस में चमचों से घिरे रहने से उन्हें वैसा ही जोश व ‘मरदानी ताकत’ मिलता था, जैसे कुछ लोगों को वियाग्रा खाने के बाद मिलता है। चमचों के लेख, फीचर, कहानियां, कविताएं वे बिना पढ़े ही छापा करते थे। और जो उनके दरबार में हाजिरी नहीं लगाता, बिना पढ़े ही कचरे के डब्बे में रचनाएं जाती थीं। 
एक दिन एक युवक उनसे पूछ ही बैठा, ‘‘सर, मैं कई रचनाएं आपको दे चुका हूं। एक भी नहीं छपी।’’ वर्मा जी तपाक से बोले, ‘‘कल मेरे लिए एक पैंट-शर्ट लेकर मेरे घर आ जाना, छप जाएगी।’’ युवक उन्हें गौर से देखने लगा। तब वर्मा जी ने हंसकर कहा था, ‘‘एक अप्रैल है भई, मजाक कर रहा हूं। इतना भी नहीं समझते ?’’ 
ते साहेब, वह युवक समझा हो या नहीं, आप तो समझ ही गये होंगे। भूख और भुक्खड़ की बातें।