COPYRIGHT © RAJIV MANI, Journalist, Patna

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गुरुवार, 19 मई 2016

प्रकाशक, लेखक और किताब

आजकल फेसबुक पर प्रकाशकों के बीच पैसे लेकर किताब छापने की होड़ मची है। कोई अपनी किताब में एक रचना छापने का 350 रुपए ले रहा है, तो कोई 5 पन्ने आपके नाम करने का 1,500 रुपए। कुछ प्रकाशक तो 2,000 रुपए में 6 पन्ने देने को अपने ग्राहक खोज रहे हैं। ऐसे में सवाल है कि जिसके पास पैसे हैं, वे साहित्यकार और जिसके पास नहीं हैं, वे ......... !  हां, कुछ प्रकाशक 1,500 या 2,000 रुपए में ही किताब के साथ सम्मान पत्र भी आपको बेच रहे हैं। भई, मजे की बात यह है कि अगर आप 2,000 रुपए लगाते हैं तो एक किताब में आपका 5 या 6 पन्ना सुरक्षित हो जाता है। साथ ही, आप उनके सम्मान समारोह में जाते हैं तो 2,000 रुपए अलग से खर्च ! यानी आप चार हजार खर्च कर किसी किताब में 5 या 6 पन्ना पाते हैं। तो लीजिए, आप बन गए साहित्यकार !
यही वजह है कि कुछ लेखक ही अब प्रकाशन बन रहे हैं। ऐसे कई उदाहरण हैं। कारण साफ है, एक किताब छापने में 10 से 15 हजार रुपए के बीच खर्च आते हैं। और यदी साझा संग्रह में 30 लेखकों को भी शामिल किया जाए तो 30 गुणा 2,000 यानी 60,000 रुपए। इसमें से लेखकों को किताबें भेजने का डाक खर्च और सम्मान पत्र पर 15,000 रुपए रख लें। यानी 30,000 रुपए का शुद्ध मुनाफा। सिर्फ एक किताब में !
हां, कोई बिना पैसे लिए छापने को तैयार हो जाए तो मुझे भी बताएं। मैं आपका आभारी रहूंगा।
वैसे छात्र जीवन में तो मैंने सुना था कि किताबे प्रकाशित करने पर प्रकाशक ही लेखकों को पैसे देते है। लगता है किसी ने मजाक किया था। है ना ?
बुरा मान गए भई, मैं तो मजाक कर रहा था !