COPYRIGHT © RAJIV MANI, Journalist, Patna

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बुधवार, 6 जुलाई 2016

तनहाई

 कविता 
राजीव मणि
तब मैं तनहा

खोजता था किसी का साथ
हर वक्त, हर पहर
ढूंढती थीं निगाहें किसी को
... और तभी तुम मिले।
कई बसंत बिताये हैं हमने
एकसाथ
विशाल वृक्षों से
गिरते पत्तों को देखा
और फिर
छाती हुई हरियाली
सजते हुए रंग-बिरंगे फूल भी।
इसी बीच
मिलने-जुलने में
ना जाने क्या हुआ
मैंने खुद को भुला दिया
और अब
बस, खोजता हूं खुद को
हर वक्त, हर पहर
अपने ही आसपास।